हमदर्दी का अभाव: जब इंसान को दूसरों का दर्द नजर नहीं आता हमदर्दी यानी दूसरों के दुख-दर्द को समझना और महसूस करना...ये हमें जोड़ता है और अच्छा इंसान बनाता है। लेकिन कभी-कभी हम इतने बेरहम हो जाते हैं कि किसी का तकलीफ हमें छूता भी नहीं है। क्यों ऐसा हो जाता है? इस लेख में हम इसी के बारे में जानेंगे। हमदर्दी – क्या होती है? दूसरे के दर्द में खुद दर्द महसूस करने को 'भावनात्मक हमदर्दी' कहते हैं। किसी की परिस्थिति को समझना यानी दिमाग से महसूस करना 'संज्ञानात्मक हमदर्दी' कहलाता है। और जब उस दर्द को दूर करने की चाहत हो, उसे 'करुणा' कहते हैं। हमदर्दी खत्म क्यों हो जाती है? इंसान न समझना: हम अक्सर दूसरों को अलग, कमतर, या गलत समझने लगते हैं, तो हमदर्दी गायब हो जाती है। जैसे, नस्लवाद या युद्ध के समय में। अति-दुख से बचाव बहुत ज्यादा तकलीफें देख कर हम सुन्न हो सकते हैं, खुद की भावनाओं को बचाने के लिए। दूर देश की बुरी खबरें अक्सर ऐसा असर करती हैं। कोई और मदद करेगा: भीड़ में हम जिम्मेदारी महसूस नहीं करते। लगता है कोई और ही मदद कर देगा। दूरी और बोझिल आंकड़े: बहुत दूर के लोगो...